aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पहचान: मुहद्दिस, सूफ़ी, मुसन्निफ़
सिराजुल अस्फ़िया हज़रत अल्लामा मुफ़्ती हाफ़िज़ अबुज़्ज़का शाह मुहम्मद सलामतुल्लाह मुहद्दिस रामपुरी, बर्रे-सगीर हिन्द के उन महान उलेमा और मशायिख़ में शुमार होते हैं जिन्होंने इल्म-ओ-इरफ़ान, रश्द-ओ-हिदायत तथा तस्नीफ़-ओ-तदरीस के मैदान में अमूल्य सेवाएँ अंजाम दीं। आपकी विलादत ज़िला आज़मगढ़ (यू.पी.) में हुई। प्रारम्भ से ही इल्मी ज़ौक़, दीन से लगाव और रूहानी रुझान आपकी शख़्सियत का प्रमुख गुण था, जिसके कारण आपने उलूम-ए-दीनिया में उच्च स्थान प्राप्त किया और अपने दौर के अकाबिर अहल-ए-इल्म में विशिष्ट पहचान बनाई।
आप जईद आलिम-ए-दीन, बुलंद पाया मुहद्दिस, मुजाज़-ए-तरीक़त, साहिब-ए-तस्नीफ़ बुज़ुर्ग तथा मदरसा इरशादुल उलूम रामपुर के नाज़िम व मुदर्रिस थे। फ़िक़्ह, हदीस, मंतिक़ और तसव्वुफ़ जैसे गूढ़ विषयों पर आपको पूर्ण अधिकार प्राप्त था। आपकी दरसगाह इल्म व अमल का केंद्र थी, जहाँ ज्ञान-पिपासु आपके फ़ैज़ से लाभान्वित होते थे। आप केवल ज़ाहिरी उलूम के माहिर ही नहीं थे, बल्कि तज़्किया-ए-बातिन, तक़्वा, ज़ुह्द और रूहानी तरबियत में भी यगानाए-रोज़गार माने जाते थे।
हज़रत शाह मुहम्मद सलामतुल्लाह रामपुरी की मुबारक ज़िंदगी इख़्लास, लिल्लाहियत, क़नाअत और ख़िदमत-ए-दीन का उज्ज्वल प्रतीक थी। आपने अपनी पूरी ज़िंदगी इशाअत-ए-उलूम-ए-नबवी, इस्लाह-ए-मुआशरा और तरबियत-ए-ख़ल्क़ के लिए समर्पित कर दी। आपकी तस्नीफ़ात अपने इल्मी इस्तेहकाम, तहक़ीक़ी अंदाज़ और इस्लाही रंग के कारण अहल-ए-इल्म में अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखी जाती हैं।
आपका विसाल 8 जमादी-उल-अव्वल 1338 हिजरी, मुताबिक जनवरी 1920 ईस्वी में हुआ, जबकि तद्फ़ीन दरगाह-ए-इरशादिया रामपुर (यू.पी.) हिन्द में हुई। आज भी आपका नाम इल्मी और रूहानी हल्क़ों में अत्यंत अदब और अकीदत के साथ लिया जाता है।