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पहचान: प्रख्यात शिक्षाविद, मनोवैज्ञानिक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रभावशाली शैक्षिक प्रशासक
सलामतुल्लाह ख़ान का जन्म 4 अगस्त 1913 को उत्तर प्रदेश के ज़िला इटावा के छोटे से गाँव सहगल में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा अपने गाँव में प्राप्त की, जबकि 1934 में गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, इटावा से इंटरमीडिएट पूरा किया। इसके बाद 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया, जहाँ से बी.एससी. और एम.एससी. की डिग्रियाँ प्राप्त कीं। उच्च शिक्षा के बाद वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के टीचर्स कॉलेज से संबद्ध हो गए, जहाँ उनकी शैक्षिक और अध्यापन संबंधी क्षमताएँ उभरकर सामने आईं।
1946 से 1948 तक उन्हें अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क के टीचर्स कॉलेज में फ़ेलोशिप पर अध्ययन करने का अवसर मिला। वहाँ से उन्होंने एजुकेशन में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। विदेश से उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वे पुनः जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़े और अध्यापन, शोध तथा शैक्षिक योजना निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सेवाएँ अंजाम दीं।
डॉ. सलामतुल्लाह ख़ान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के टीचर्स कॉलेज के डीन रहे और भारत में आधुनिक शैक्षिक चिंतन, शैक्षिक मनोविज्ञान तथा पाठ्यक्रम सुधारों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रयासों से अध्यापक प्रशिक्षण, शिक्षण पद्धतियों तथा विद्यार्थियों के मानसिक और बौद्धिक विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।
उन्होंने उर्दू भाषा में शिक्षा और शैक्षिक मनोविज्ञान के विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में “हम कैसे पढ़ाएँ”, “तालीम और उसका सामाजिक पृष्ठभूमि”, “बुनियादी उस्ताद के लिए” और “तालीम, फ़लसफ़ा और समाज” विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन पुस्तकों में उन्होंने शिक्षण सिद्धांतों, विद्यार्थियों की मनोवृत्ति, शैक्षिक वातावरण और सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका को सरल और प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। उर्दू में शैक्षिक मनोविज्ञान को लोकप्रिय बनाने में उनकी सेवाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उनकी आत्मकथा “यादों के चराग़” न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की झलक प्रस्तुत करती है बल्कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उस दौर के शैक्षिक वातावरण और समकालीन शिक्षकों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी देती है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया से सेवानिवृत्ति के बाद भी वे शैक्षिक और बौद्धिक गतिविधियों से जुड़े रहे। उन्होंने दो वर्ष एन.सी.ई.आर.टी. में तथा बाद में कश्मीर यूनिवर्सिटी में भी सेवाएँ दीं।
निधन: 2002 में उनका निधन हुआ।