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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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लेखक: परिचय


लाल क़िला की दर्द भरी आवाज़

बहादुर शाह ज़फ़र की असाधारण शोहरत की वजह 1857 ई. का इन्क़लाब है, हालांकि उनकी सार्वभौमिक व्यक्तित्व में इस बात का बड़ा दख़ल है कि वो अवध के एक अहम शायर थे। बहादुर शाह ज़फ़र जिस तरह बादशाह की हैसियत से अंग्रेज़ों की चालों का शिकार हुए उसी तरह एक शायर की हैसियत से भी उनके सर से शायरी का ताज छिनने की कोशिश की गई और कहा गया कि ज़फ़र की शायरी में जो खूबियां हैं वो उनके उस्ताद ज़ौक़ की देन हैं। सर सय्यद के सामने जब इस ख़्याल का इज़हार किया गया, तो वो भड़क उठे थे और कहा था कि “ज़ौक़ उनको लिख कर क्या देते, उसने तो ख़ुद ज़बान क़िला-ए-मुअल्ला से सीखी थी।” इसमें शक नहीं कि ज़फ़र उन शायरों में हैं जिन्होंने काव्य अभिव्यक्ति में उर्दूपन को बढ़ावा दिया और यही उर्दूपन ज़फ़र के साथ ज़ौक और दाग़ के वसीले से बीसवीं सदी के आम शायरों तक पहुंचा। मौलाना हाली ने कहा, “ज़फ़र का तमाम दीवान ज़बान की सफ़ाई और रोज़मर्रा की ख़ूबी हैं, आरम्भ से आख़िर तक यकसाँ है।” और आब-ए-बक़ा के मुसन्निफ़ ख़्वाजा अब्दुल रऊफ़ इशरत का कहना है कि “अगर ज़फ़र के कलाम पर इस एतबार से नज़र डाला जाये कि उसमें मुहावरा किस तरह अदा हुआ है, रोज़मर्रा कैसा है, असर कितना है और ज़बान कितनी प्रमाणिक है तो उनका उदाहरण और मिसाल आपको न मिलेगा। ज़फ़र बतौर शायर अपने ज़माने में मशहूर और मक़बूल थे।” मुंशी करीम उद्दीन “तबक़ात-ए-शोअराए हिंद”  में लिखते हैं, “शे’र ऐसा कहते हैं कि हमारे ज़माने में उनके बराबर कोई नहीं कह सकता। तमाम हिंदोस्तान में अक्सर क़व्वाली और रंडियां उनकी ग़ज़लें, गीत और ठुमरियां गाते हैं।”

बहादुर शाह ज़फ़र का नाम अबू ज़फ़र सिराज उद्दीन मुहम्मद था। उनकी पैदाइश अकबर शाह सानी के ज़माना-ए-वलीअहदी में उनकी हिंदू बीवी लाल बाई के बतन से 14 अक्तूबर 1775 ई. में हुई। अबू ज़फ़र तारीख़ी नाम है। इसी मुताबिक़त से उन्होंने अपना तख़ल्लुस ज़फ़र रखा। चूँकि बहादुर शाह के पूर्वज औरंगज़ेब के बेटे का लक़ब भी बहादुर शाह था लिहाज़ा वो बहादुर शाह सानी कहलाए। उनकी शिक्षा क़िला-ए-मुअल्ला में पूरे एहतिमाम के साथ हुई और उन्होंने विभिन्न ज्ञान व कलाओं में दक्षता प्राप्त की। लाल क़िला की तहज़ीबी ज़िंदगी और उसके मशाग़ल में भी उन्होंने गहरी दिलचस्पी ली। शाह आलम सानी का देहांत उस वक़्त हुआ जब ज़फ़र की उम्र 31 साल थी, लिहाज़ा उन्हें दादा की संगत से फ़ायदा उठाने का पूरा मौक़ा मिला। उन ही की संगत के नतीजे में बहादुर शाह को मुख़्तलिफ़ ज़बानों पर क़ुदरत हासिल हुई। उर्दू और फ़ारसी के साथ साथ बृज भाषा और पंजाबी में भी उनका कलाम मौजूद है। ज़फ़र एक विनम्र और रहमदिल इंसान थे। उनके अंदर सहिष्णुता और करुणा थी और अभिमान व घमंड उनको छू कर नहीं गया था। शाहाना ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी गुज़ारने के बावजूद उन्होंने शराब को कभी हाथ नहीं लगाया। शहज़ादगी के ज़माने से ही मज़हब की तरफ़ झुकाव था और काले साहिब के मुरीद थे। अपने वालिद अकबर शाह सानी के ग्यारह लड़कों में वो सबसे बड़े थे लेकिन अकबर शाह अपने दूसरे चहेते बेटे मिर्ज़ा सलीम को वलीअहद बनाना चाहा। अंग्रेज़ उसके लिए राज़ी नहीं हुए। फिर अकबर शाह सानी की चहेती बीवी मुमताज़ महल ने अपने बेटे मिर्ज़ा जहांगीर को वलीअहद बनाने की कोशिश की बल्कि उनकी वलीअहदी का ऐलान भी कर दिया गया और गवर्नर जनरल को इसकी इत्तिला कर दी गई जिस पर गवर्नर जनरल ने सख़्त चेतावनी की कि अगर उन्होंने अंग्रेज़ों की हिदायात पर अमल न किया तो उनकी पेंशन बंद कर दी जाएगी। मिर्ज़ा जहांगीर ने एक मर्तबा ज़फ़र को ज़हर देने की भी कोशिश की और उन पर अप्राकृतिक व्यवहार के भी आरोप लगाए गए लेकिन अंग्रेज़ ज़फ़र की इज़्ज़त करते थे और उनके ख़िलाफ़ महल की कोई साज़िश कामयाब नहीं हुई। 1837 ई. में अकबर शाह सानी के देहांत के बाद बहादुर शाह की ताजपोशी हुई।

क़िले के नियम के अनुसार बहादुर शाह ज़फ़र की शादी नव उम्र ही में ही कर दी गई थी और ताजपोशी के वक़्त वो पोते-पोतियों वाले थे। ज़फ़र की बेगमात की सही तादाद नहीं मालूम लेकिन विभिन्न सूत्रों से शराफ़त महल बेगम, ज़ीनत महल मबीतम, ताज महल बेगम, शाह आबादी बेगम, अख़तरी महल बेगम, सरदारी बेगम के नाम मिलते हैं, उनमें ज़ीनत महल सबसे ज़्यादा चहेती थीं और उनसे ज़फ़र ने उस वक़्त 1840 ई.में शादी की थी जब उनकी उम्र 65 साल थी जब कि ज़ीनत महल 19 साल की थीं। ताजमहल बेगम भी बादशाह की चहेती बीवीयों में थीं। शाह आबादी बेगम का असल नाम हिन्दी बाई था। अख़तरी महल बेगम एक गाने वाली थीं, सरदारी बेगम एक ग़रीब घरेलू मुलाज़िमा थीं जिनको ज़फ़र ने रानी बना लिया। ज़फ़र के 16  बेटे और 31 बेटियां थीं। बारह शहज़ादे 1857 ई. तक ज़िंदा थे। बहादुर शाह एक बहुमुखी इंसान थे। वो हिन्दुओं की भावनाओं की भी क़द्र करते थे और उनकी कई रीतियों को भी अदा करते थे। उन्होंने शाह अब्बास की दरगाह पर चढ़ाने के लिए एक अलम लखनऊ भेजा था जिसके नतीजे में अफ़वाह फैल गई थी कि वो शिया हो गए हैं लेकिन ज़फ़र ने इसका खंडन किया। अंग्रेज़ों की तरफ़ से ज़फ़र को एक लाख रुपये पेंशन मिलती थी जो उनके शाहाना ख़र्चे के लिए काफ़ी नहीं थी लिहाज़ा वो हमेशा आर्थिक तंगी का शिकार और क़र्ज़दार रहते थे। साहूकारों के तक़ाज़े उनको फ़िक्रमंद रखते थे और वह नज़राने वसूल करके नौकरियां और ओहदे तक़सीम करते थे। लाल क़िले के अंदर चोरियों और ग़बन के वाक़ियात शुरू हो गए थे।

बहादुर शाह की उम्र बढ़ने के साथ अंग्रेज़ों ने फ़ैसला कर लिया था कि दिल्ली की बादशाहत ख़त्म कर दी जाएगी और लाल क़िला ख़ाली करा के शहज़ादों का वज़ीफ़ा मुक़र्रर कर दिया जाएगा। इस सिलसिले में उन्होंने शहज़ादा मिर्ज़ा फ़ख़रू से जो वलीअहदी के उम्मीदवार थे, एक समझौता भी कर लिया था लेकिन कुछ ही दिनों बाद 1857 ई. का हंगामा बरपा हो गया, जिसका नेतृत्व दिल्ली में शहज़ादा मुग़ल ने की। कुछ दिनों के लिए दिल्ली बाग़ीयों के क़ब्ज़े में आ गई थी। बहादुर शाह शुरू में इस हंगामे से बिल्कुल अनभिज्ञ रहे। वो समझ ही नहीं पाए कि हो क्या रहा है। जब उनको पता चला कि हिंदुस्तानी सिपाहीयों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी है तो उनकी परेशानी बढ़ गई। उन्होंने कोशिश की कि बाग़ी अपने इरादे से बाज़ आ जाएं और बाग़ीयों से कहा कि वो अंग्रेज़ों से उनकी सुलह करा देंगे, लेकिन जब बाग़ीयों ने पूरी तरह दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया तो उनको ज़बरदस्ती मजबूर किया कि वो आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में लें। शुरू में उन्होंने न चाहते हुए इस ज़बरदस्ती को क़बूल किया था लेकिन जब आंदोलन ज़ोर पकड़ गया तो वो उसमें फँसते चले गए और आख़िर तक आंदोलन के साथ रहे। ये आंदोलन बहरहाल जल्द ही दम तोड़ गया। बहादुर शाह को गिरफ़्तार कर लिया गया। गिरफ़्तारी के बाद मुक़द्दमे की सुनवाई के दौरान बहादुर शाह ने इंतहाई बेचारगी के दिन गुज़ारे। क़ैद मैं उनसे मिलने गई एक ख़ातून ने उनकी हालत इस तरह बयान की है, “हम निहायत तंग-ओ-तारीक छोटे से कमरे में दाख़िल हुए। यहां मैले कुचैले कपड़े पहने हुए एक कमज़ोर, दुबला पतला, पस्ताकद बूढ्ढा सर्दी के सबब गंदी रज़ाइयों में लिपटा एक नीची सी चारपाई पर पड़ा था। हमारे दाख़िल होते ही वो हुक़्क़ा जो वो पी रहा था, एक तरफ़ रख दिया और फिर वो शख़्स जो कभी किसी को अपने दरबार में बैठा हुआ देखता, अपनी तौहीन समझता था, खड़े हो कर हमको निहायत आजिज़ी से सलाम करता जा रहा था कि उसे हमसे मिलकर बड़ी ख़ुशी हुई।”  19 मार्च 1958 को अदालत ने बहादुर शाह ज़फ़र को उन सभी अपराधों का दोषी पाया जिनका उन पर इल्ज़ाम लगाया गया था। 7 अक्तूबर 1858  को पूर्व शहनशाह दिल्ली और मुग़लिया सलतनत के आख़िरी ताजदार अबू ज़फ़र सिराज उद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह सानी ने दिल्ली को हमेशा के लिए ख़ैर बाद कह दिया और रंगून में जिला वतनी के दिन गुज़ारते हुए 7 नवंबर 1860 को सुबह पाँच बजे क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म से छूट गए।

ज़फ़र ने अपने आख़िरी ज़माने में इंतहाई पुरदर्द ग़ज़लें कहीं। अदब के शायरों से उनको हमेशा गहरा लगाव रहा। उन्होंने मुख़्तलिफ़ ज़बानों में शाह नसीर, इज़्ज़त उल्लाह इश्क़, मीर काज़िम बेक़रार, ज़ौक़ और ग़ालिब को अपना कलाम दिखाया। उनकी शायरी मुख़्तलिफ़ दौर में मुख़्तलिफ़ रंग लेती रही, इसलिए उनके कलाम में हर तरह के अशआर पाए जाते हैं। ज़फ़र के चुनिंदा कलाम में उनकी अपनी विशिष्टता स्पष्ट है। ग़ज़ल कहना, काव्य मनोदशा और सौंदर्य रचना के संदर्भ में उनका ये कलाम उर्दू ग़ज़ल के उस सरमाये से क़रीब आ जाता है जिसे मीर, क़ाएम, यकीन, दर्द, मुसहफ़ी, सोज़, और आतिश जैसे शायरों ने सींचित किया। ज़फ़र के कलाम का चयनित अंश अपने अंदर ऐसी ताज़गी, दिलकशी और प्रभावशीलता का तत्व रखता है जिसके अपने शाश्वत मूल्य हैं,  विशेष रूप से वो हिस्सा जिसमें ज़फ़र की “आप बीती” है, इसमें कुछ ऐसी चुभन और गलन है जो उर्दू ग़ज़ल के सरमाये में अपना जवाब नहीं रखता;
शम्मा जलती है पर इस तरह कहाँ जलती है
हड्डी हड्डी मिरी ऐ सोज़-ए-निहाँ चलती है

ज़फ़र की पूरी ज़िंदगी एक तरह की रुहानी कश्मकश और ज़हनी जिला वतनी में गुज़री। एक मुसलसल अज़ाब गुत्था। हड्डियों को पिघला देने वाला यही ग़म उनकी शायरी की मूल प्रेरणा है और उस आग में जल कर उन्होंने जो शे’र कहे हैं वो हमारे सामने एक ज़बरदस्त दुखद चरित्र पेश करते हैं;
हर-नफ़स इस दामन-ए-मिज़्गाँ की जुंबिश से ज़फ़र
इक शोला सा भड़का और भड़क कर रह गया

ज़फ़र की शायरी आज अपने दर्जे के नए सिरे से परीक्षण की मांग करती है।


.....और पढ़िए

उर्दू ज़बान और मुहावरे पर ज़बरदस्त गिरफ़्त रखने वाले शायर और नस्र (गद्य) में मुहम्मद हसन आज़ाद और ग़ज़ल में दाग़ जैसे उस्तादों के उस्ताद, मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ एक मुद्दत तक उपेक्षा का शिकार रहने के बाद एक बार फिर अपने मुनकिरों से अपना लोहा मनवा रहे हैं मुग़लिया सलतनत के नाममात्र बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के दौर में, मलक-उश-शोअरा के ख़िताब से नवाज़े जाने वाले ज़ौक़ अपने ज़माने के दूसरे अहम शायरों, ग़ालिब और मोमिन से बड़े शायर माने जाते थे लेकिन ज़माने के मिज़ाज ने इस तेज़ी से करवट ली कि उनको एक मामूली शायर कह कर रद्द कर दिया गया, यहां तक कि रशीद हसन ख़ां ने कह दिया कि ग़ज़ल में ग़ालिब और मोमिन के साथ ज़ौक़ का नाम लेना भी गुनाह है। ये ग़ालिब परस्ती का दौर था। ज़ौक़ को जब ग़ालिब का विरोधी और प्रतिद्वंदी समझ कर और ग़ालिब को अच्छी शायरी का हवाला बना कर पढ़ने का चलन आम हुआ तो ज़ौक़ की शिकस्त लाज़िमी थी। दोनों का मैदान अलग है, दोनों की ज़बान अलग है और दोनों की दुनिया भी अलग है।
शेख़ मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ के वालिद मुहम्मद रमज़ान एक नौ मुस्लिम खत्री घराने से ताल्लुक़ रखते थे। उनका घराना इल्म-ओ-अदब से दूर था। ज़ौक़ को हाफ़िज़ ग़ुलाम रसूल के मदरसे में दाख़िल कर दिया गया। ग़ुलाम रसूल ख़ुद भी शायर थे और शौक़ तख़ल्लुस करते थे। उन ही की संगत में ज़ौक़ को शायरी का शौक़ पैदा हुआ। शौक़ से ही वो अपनी आरम्भिक ग़ज़लों पर इस्लाह लेते थे और तख़ल्लुस ज़ौक़ भी उन्हीं का दिया हुआ था। कुछ अर्से बाद ज़ौक़ ने मौलवी अब्दुल रज़्ज़ाक़ के मदरसे में दाख़िला ले लिया। यहां उनके बचपन के दोस्त मीर काज़िम अली बेक़रार उनके सहपाठी थे। बेक़रार नवाब रज़ी ख़ां, वकील सुलतानी के भांजे और बहादुर शाह ज़फ़र के ख़ास मुलाज़िम थे, जो उस वक़्त तक महज़ वली अहद थे, बादशाह अकबर शाह सानी थे। बेक़रार के ही माध्यम से ज़ौक़ की पहुंच क़िले तक हुई।

शायरी एक ललित कला है और शायरी की तरफ़ झुकाव ज़ौक़ की कुलीनता की दलील है। ज़ौक़ ने बहरहाल छात्र जीवन में इस शौक़ को अपनी तबीयत पर हावी नहीं होने दिया, उन्होंने अपने शौक़ और मेहनत से प्रचलित ज्ञान जैसे ज्योतिष, चिकित्सा, इतिहास आदि में दक्षता प्राप्त की और हर कला में माहिर हो गए। 
क़िस्मत से ही मजबूर हूँ ऐ ज़ौक़ वगरना
हर फ़न में हूँ मैं ताक़ मुझे क्या नहीं आता

शायरी का सिलसिला बहरहाल जारी था और वो अपनी ग़ज़लें शौक़ को ही दिखाते थे। लेकिन जल्द ही वो शौक़ की इस्लाह से असंतुष्ट हो गए और अपने ज़माने के मशहूर उस्ताद शाह नसीर की शागिर्दी इख़्तियार कर ली।

क़िले तक पहुंच बनाने के बाद ज़ौक़ बाक़ायदा दरबारी मुशायरों में शिरकत करने लगे। उनके एक क़सीदे से ख़ुश हो कर अकबर शाह सानी ने उनको खाक़ानी-ए-हिंद का ख़िताब दिया। शहर में इसके बड़े चर्चे हुए, एक नौ उम्र शायर को ख़ाक़ानी-ए-हिंद का ख़िताब मिलना एक अनोखी बात थी। बाद में ज़ौक़ को सौदा के बाद उर्दू का दूसरा बड़ा क़सीदा निगार तस्लीम किया गया। उनके क़साइद की फ़िज़ा इल्मी और अदबी है और कला के एतबार से बहुत सराहनीय है। जल्द ही उनकी शोहरत और लोकप्रियता सारे शहर में फैल गई, यहां तक कि उनके उस्ताद शाह नसीर उनसे हसद करने लगे। वो ज़ौक़ के शे’रों पर अनावश्यक रूप से आलोचना करते, लेकिन ज़ौक़ ने कभी अदब का दामन हाथ से नहीं जाने दिया। ज़ौक़ की सार्वजनिक लोकप्रियता ही समस्त आलोचनाओं का जवाब था। वली अहद मिर्ज़ा अबू ज़फ़र (बहादुर शाह) की सरकार से उनको चार रुपये माहाना वज़ीफ़ा मिलता था (ख़्याल रहे कि उस वक़्त तक ख़ुद ज़फ़र का वज़ीफ़ा 500 रुपये माहाना था),जो बाद मुद्दत 100 रुपये हो गया। ज़ौक़ धन-सम्पत्ति के तलबगार नहीं थे, वो बस दिल्ली में माननीय बने रहना चाहते थे। उनको अपने देश से मुहब्बत थी। सादगी इतनी कि कई मकानात होते हुए भी उम्र भर एक छोटे से मकान में रहते रहे। दिल्ली से अपनी मुहब्बत का इज़हार उन्होंने अपने शे’रों में भी किया;
इन दिनों गरचे दकन में है बहुत क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाये ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

न ख़ुदा से शिकवा, न बंदों से शिकायत। उनकी उम्र भर की पूँजी बस शे’र गोई थी। लेकिन बदक़िस्मती से उनका पूरा कलाम भी हम तक नहीं पहुंच सका। ग़ज़ल की पाण्डुलिपि वो तकिये के गिलाफ़, घड़े या मटके में डाल देते थे। देहांत के बाद उनके शागिर्दों ने कलाम संकलित किया और काम पूरा न होने पाया था कि 1857  ई. का ग़दर हो गया। ज़ौक़ के देहांत के लगभग चालीस साल बाद उनका कलाम प्रकाशित हुआ।

ज़ौक़ की ज़िंदगी के वाक़ियात ज़्यादातर उनकी शायराना ज़िंदगी और सुख़नवराना मारकों से ताल्लुक़ रखते हैं। ज़ौक़ से पहले शहर में शाह नसीर की उस्तादी का डंका बज रहा था, वो चटियल ज़मीनों और मुश्किल रदीफ़ों जैसे “सर पर तुर्रा हार गले में” और “फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ” के साथ ग़ज़लें कह कर शहर को प्रभावित किए हुए थे। ज़ौक़ जब उनसे ज़्यादा मक़बूल और मशहूर हो गए तो उन्होंने ज़ौक़ को नीचा दिखाने के लिए बहुत से हथकंडे अपनाए लेकिन हर मैदान में ज़ौक़ कामयाब हुए। ज़ौक़ ने कभी अपनी तरफ़ से छेड़-छाड़ शुरू नहीं की और न कभी निंदा लिखी।
ग़ालिब कभी कभी चुटकियां लेते थे। शायरी में ज़ौक़ का सिलसिला शाह नसीर से होता हुआ सौदा तक पहुंचता था। ज़ौक़ के कलाम में मीर की सी दर्दमंदी और कसक के कमी पर फबती कसते हुए ग़ालिब ने कहा; 
ग़ालिब अपना भी अक़ीदा है बक़ौल नासिख़
आप बे-बहरा है जो मो’तक़िद-ए-मीर नहीं

ग़ालिब ने अपने मक़ते में नासिख़ का नाम लेकर ये भी इशारा कर दिया कि शायर-ए-उस्ताद मा’नवी नासिख़ भी मीर से प्रभावित थे और तुम्हारे कलाम में मीर की कोई झलक तक नहीं। इसके जवाब में ज़ौक़ ने कहा, 
न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब
ज़ौक़ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा

अर्थात तुम्हारे यहां कब मीर जैसा सोज़-ओ-गुदाज़ है, बस ख़्याली मज़मून बाँधते हो। शहज़ादा जवान बख़्त की शादी के मौक़े पर ग़ालिब ने एक सेहरा लिखा जिसमें शायराना शेखी से काम लेते हुए उन्होंने कहा; 
हमसुख़न फ़हम हैं ग़ालिब के तरफ़दार नहीं
देखें कह दे कोई इस सेहरे से बेहतर सेहरा

ये बात बहादुर शाह को गिरां गुज़री, जैसे उन पर चोट की जा रही है कि वो सुख़न फ़हम नहीं तभी ग़ालिब को छोड़कर ज़ौक़ को उस्ताद बना रखा है। उन्होंने ज़ौक़ से फ़र्माइश की कि इस सेहरे का जवाब लिखा जाये। ज़ौक़ ने सेहरा लिखा और मक़ते में ग़ालिब के शे’र का जवाब दे दिया;
जिनको दावा-ए-सुख़न है, ये उन्हें दिखला दो
देखो इस तरह से कहते हैं सुखनवर सेहरा

बहरहाल ग़ालिब ज़ौक़ पर चोटें कस ही दिया करते थे मगर इस ख़ूबी से कि नाम अपना डालते थे और समझने वाले समझ जाते था कि इशारा किस तरफ़ है;
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है

ज़ौक़ ने ग़ज़ल के बने-बनाए दायरे में शायरी की लेकिन घिसे-पिटे विषयों को कलात्मक नवाचार के साथ प्रस्तुत कर के उस्तादी का हक़ अदा कर दिया। उनके अनगिनत शे’र आज तक कहावत बन कर लोगों की ज़बान पर हैं;
फूल तो दो दिन बहार-ए-जां फ़िज़ा दिखला गए
हसरत उन ग़ुंचों पे है जो बिन खिले मुर्झा गए

ऐ ज़ौक़ किसी हम-दम-ए-देरीना का मिलना
बेहतर है मुलाक़ात मसीहा-ओ-ख़िज़्र से

बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो
ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो

ऐ ज़ौक़ तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर
आराम से हैं वो जो तकल्लुफ़ नहीं करते 

ऐ ज़ौक़ इतना दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई

नैतिक और उपदेशात्मक बातों में ज़ौक़ ने ख़ास चाबुकदस्ती से काम लिया है और दृष्टांत का ढंग उनके अशआर में प्रभाव भर देता है। ज़बान की सफ़ाई, मुहावरे की सेहत और बंदिश की चुस्ती, ज़ौक़ की ग़ज़ल की आम खूबियां हैं। उनके शे’र किसी गहरे ग़ौर-ओ-फ़िक्र की दावत नहीं देते और वो ऐसी ज़बान इस्तेमाल करते हैं जो रोज़मर्रा के मुताबिक़ हो और सुनने वाले को किसी उलझन में न डाले। फ़िराक़ गोरखपुरी ज़ौक़ के सरेआम मुनकिर होने के बावजूद लिखते हैं:

“आर्ट के मायनी हैं किसी चीज़ को बनाना और फ़न के लिहाज़ से ज़ौक़ का कारनामा भुलाया ही नहीं जा सकता। उस कारनामे की अपनी एक हैसियत है ज़ौक़ के यहां। चीज़ें, जो हमें महबूब-ओ-मर्ग़ूब हैं, न पाकर हमें बेसब्री से ज़ौक़ का दीवान अलग नहीं फेंक देना चाहिए। अगर हमने ज़रा ताम्मुल और रवादारी से काम लिया तो अपना अलग मज़ाक़ रखते हुए भी ज़ौक़ के मज़ाक़-ए-सुख़न से हम लुत्फ़ अंदोज़ हो सकते हैं।” फ़िराक़ ज़ौक़ की शायरी को “पंचायती शायरी” कहते हैं लेकिन उनके शे’र, 
रुख़सत ऐ ज़िंदाँ जुनूँ ज़ंजीर-ए-दर खड़काए है
मुज़्दा-ए-ख़ार-ए-दश्त फिर तलवा मिरा खुजलाए है

को शे’री चमत्कार भी मानने पर मजबूर हो जाते हैं। उसी तरह शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ज़ौक़ से कुछ ज़्यादा मुतास्सिर न होने के बावजूद उनकी शायरी से लुत्फ़ अंदोज़ होने को स्वीकार करते हैं। यहां ज़ौक़ का ये शे’र बराबर महल्ल-ए-नज़र आता है:

बाद रंजिश के गले मिलते हुए रुकता है दिल
अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढ़ूँ कुछ तू बढ़े।

 

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