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पहचान: प्रगतिशील लेखक, उपन्यासकार, कवि और ख़ाका-निगार
कश्मीरी लाल ज़ाकिर प्रगतिशील सोच से जुड़े महत्वपूर्ण लेखक और शायर माने जाते हैं। उन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास के ज़रिए देश की राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याओं के ख़िलाफ़ लगातार रचनात्मक लेखन किया।
कश्मीरी लाल ज़ाकिर 7 अप्रैल 1919 को बेगाबनियान, गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में पैदा हुए। शुरुआती पढ़ाई पुँछ रियासत और श्रीनगर के स्कूलों में की। बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी से बी.ए. और एम.ए. किया।
ज़ाकिर ने अपने साहित्यिक सफ़र की शुरुआत शायरी से की, लेकिन धीरे-धीरे वे कहानी और उपन्यास की ओर आ गए। मंटो, कृष्ण चंदर, अश्क, भीष्म साहनी और बेदी जैसे लेखकों की संगत ने उनकी कहानी कहने की कला को निखारा और उन्हें देश के मुद्दों पर एक ज़िम्मेदार लेखक की तरह सोचने में मदद दी।
देश के बँटवारे के बाद होने वाले दंगे और कश्मीर की दुखद स्थिति ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इन हालात से पैदा हुआ दर्द उनकी कहानियों का अहम हिस्सा बन गया। ‘जब कश्मीर जल रहा था’, ‘अंगूठे का निशान’, ‘उदास शाम के आख़िरी लम्हे’, ‘ख़ून फिर ख़ून है’, ‘एक लड़की भटकी हुई’ आदि इसी रचनात्मक पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं।
उनकी सौ से अधिक किताबें अलग-अलग विधाओं में प्रकाशित हुईं। उन्हें कई महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया।
निधन: 31 अगस्त 2016 को चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ।