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पहचान: प्रमुख ग़ालिब-विशेषज्ञ, शोधकर्ता, संपादक, कवि और बहुआयामी साहित्यकार
काली दास गुप्ता ‘रज़ा’ उर्दू जगत के प्रमुख शोधकर्ता, संपादक और विशेष रूप से ग़ालिब-विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ग़ालिब के जीवन और काव्य के शोध व संपादन में असाधारण सेवाएँ दीं और संपादन, आलोचना तथा कविता पर महत्वपूर्ण विद्वत्तापूर्ण कार्य किया। उनकी केवल एक पुस्तक “दीवान-ए-ग़ालिब ऐतिहासिक क्रम से” ही साहित्य के इतिहास में उनका नाम जीवित रखने के लिए पर्याप्त है।
काली दास गुप्ता ‘रज़ा’ का जन्म 25 अगस्त 1925 को जालंधर ज़िले के मुकंदपुर में हुआ। अपने पूर्वजों से मिले संस्कार उनकी व्यक्तित्व का हिस्सा थे। उनकी मातृभाषा पंजाबी थी, लेकिन उर्दू उनके अभिव्यक्ति और भावनाओं की मूल भाषा बनी, जिससे उन्हें गहरा लगाव था।
प्रारंभिक शिक्षा के बाद वे व्यावहारिक जीवन से जुड़े। पेशे से वे व्यापारी थे और व्यापार के सिलसिले में लगभग बीस वर्ष पूर्वी अफ्रीका (नैरोबी) में रहे। अली सरदार जाफ़री के अनुसार वे जीविका के लिए व्यापार करते थे और जीवन को सुंदर बनाने के लिए साहित्य की सेवा करते थे। बाद में उनके जीवन का बड़ा हिस्सा मुंबई में बीता, जहाँ वे अपने व्यवसाय के साथ-साथ निरंतर शैक्षिक और शोध कार्यों में लगे रहे।
उनके विद्वत्तापूर्ण व्यक्तित्व का सबसे प्रमुख पक्ष ग़ालिब-चिंतन था। वे ग़ालिब के प्रेमी और दीवाने थे और उनका जुनून ऐसा था कि वे दिन-रात ग़ालिब पर शोध में लगे रहते। उन्होंने ग़ालिब पर लगभग बीस पुस्तकें लिखीं, जिनमें मुतअल्लिक़ात-ए-ग़ालिब, ग़ालिबियात चंद उनवानात, दीवान-ए-ग़ालिब (अक्सी), ग़ालिब दरून-ए-ख़ाना, पंज आहंग में मकातीब-ए-ग़ालिब और तफ़हीम-ए-ग़ालिब के दो हर्फ़ आदि शामिल हैं। ग़ालिब के अलावा उन्होंने दाग़, ज़ौक़, आतिश और चकबस्त के काव्य पर भी शोध किया।
रज़ा साहब एक परिपक्व कवि भी थे और उस्ताद जोश मलसियानी के शिष्य होने के नाते उनका संबंध दाग़ परंपरा से था। उनके काव्य-संग्रहों में शोला-ए-ख़ामोश, शोरिश-ए-पिन्हां, शाख़-ए-गुल और ग़ज़ल गुलाब शामिल हैं। उनकी कविता में स्वाभाविकता, प्रवाह और भाषा पर पकड़ स्पष्ट दिखती है। वे उर्दू के साथ-साथ हिंदी शब्दों का भी सुंदर प्रयोग करते थे।
उन्हें पुस्तकों से जुनून की हद तक प्रेम था। उनकी निजी लाइब्रेरी में दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों का बड़ा संग्रह था, जिस पर उन्होंने बहुत धन खर्च किया। उनके अध्ययन की व्यापकता और स्मरण-शक्ति पर समकालीन लोग दंग रह जाते थे।
वे एक गरिमामय, संवेदनशील और गंगा-जमुनी तहज़ीब के संरक्षक इंसान थे। मुंबई में उनके घर और दफ़्तर साहित्यकारों के लिए खुले रहते, जहाँ वे बिना भेदभाव सबका स्वागत करते। जीवन के अंतिम वर्षों में निजी और बाहरी कठिनाइयों के कारण उन्होंने संघर्ष भरा समय देखा, मगर उसे धैर्य और मुस्कान के साथ बिताया।
निधन: 21 मार्च 2001 को मुंबई में उनका देहांत हुआ۔