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पहचान: दार्शनिक, सूफीवाद के विशेषज्ञ और अनुवादक
डॉ. मीर वलीउद्दीन 1903 में हैदराबाद दक्कन के ऐतिहासिक मोहल्ले फतेह दरवाज़ा में एक प्रतिष्ठित विद्वान और कुलीन परिवार में पैदा हुए। उनके पिता हैदराबाद राज्य के सम्मानित विद्वानों और संभ्रांत लोगों में गिने जाते थे, जबकि उनकी माता एक प्रमुख नवाब परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मदरसा 'मुफीद उल-अनाम' और घर पर हासिल की। 1922 में वे पंजाब यूनिवर्सिटी से मुंशी फाजिल की शिक्षा के लिए लाहौर गए, जहाँ उन्हें अल्लामा मोहम्मद इक़बाल से मुलाकात का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने 1924 में जामिया उस्मानिया से बीए और 1926 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमए किया। हैदराबाद सरकार की छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) पर वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए, जहाँ 1928 में उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से पीएचडी और मिडल टेम्पल से बैरिस्टरी की डिग्री हासिल की।
1929 में वे जामिया उस्मानिया के दर्शनशास्त्र (फिलासफी) विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हुए। 1946 में वे इसी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष बने। इसके अलावा वे 'दाइरतुल माआरिफ अल-उस्मानिया' के निदेशक (नाज़िम) भी रहे। 1958 में सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद भी वे तीन साल तक रिसर्च प्रोफेसर के रूप में अपनी शैक्षणिक सेवाएं देते रहे।
डॉ. मीर वलीउद्दीन की गिनती उर्दू में दर्शनशास्त्र, सूफीवाद और इस्लामी चिंतन के प्रमुख लेखकों में होती है। उन्होंने दर्शनशास्त्र की कठिन शब्दावली और विषयों को आसान और सरल उर्दू में पेश किया और आधुनिक दार्शनिक साहित्य को उर्दू में ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सूफीवाद, नैतिकता, इस्लामी विचार, मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) और चरित्र निर्माण पर लिखे गए उनके लेख बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वे प्रसिद्ध शोध पत्रिकाओं, विशेष रूप से "माआरिफ" के नियमित लेखक रहे, जबकि नदवतुल मुसन्निफीन, दिल्ली से भी उनका गहरा बौद्धिक संबंध था और उनकी कई किताबें वहीं से प्रकाशित हुईं।
उनकी प्रमुख कृतियों में "कुरान और तसव्वुफ", "फल्सफा क्या है", "फल्सफे की पहली किताब", "बुनियादी मसाइल-ए-फल्सफा", "इब्ताल-ए-मादियत", "बीमारी और उसका रूहानी इलाज", "इलाज-ए-खौफ-ओ-हुज्न", "कुरान और सीरत साज़ी", "कुरान और तामीर-ए-सीरत", "रुमूज-ए-इश्क़", "ख्वाजा बंदा नवाज का तसव्वुफ और सुलूक", "इक़बाल और हदीस-ए-जब्र-ओ-क़द्र", "अगर मैं तबीब होता" और "रहनुमा-ए-कुरान" शामिल हैं। उन्होंने दर्शनशास्त्र, इस्लामियात और नैतिकता की कई महत्वपूर्ण अंग्रेज़ी, अरबी और फ़ारसी किताबों का उर्दू में अनुवाद भी किया, जिनमें "मुकद्दमा-ए-फल्सफा-ए-हाज़िरा", "मुकद्दमा-ए-माबादुत तबियात", "तारीख-ए-फलासिफा-ए-इस्लाम", "तारीख-ए-मसाइल-ए-फल्सफा", "तहाफ़ुतुल फलासिफा", "मकारिमुल अख्लाक़" और "माबादुत तबियात" प्रमुख हैं।
निधन: 1 दिसंबर 1975 को हैदराबाद दक्कन में उनका निधन हुआ।