चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया

परवीन शाकिर

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया

परवीन शाकिर

MORE BY परवीन शाकिर

    चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया

    इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया

    मिरी गुल-ज़मीं तुझे चाह थी इक किताब की

    अहल-ए-किताब ने मगर क्या तिरा हाल कर दिया

    मिलते हुए दिलों के बीच और था फ़ैसला कोई

    उस ने मगर बिछड़ते वक़्त और सवाल कर दिया

    अब के हवा के साथ है दामन-ए-यार मुंतज़िर

    बानू-ए-शब के हाथ में रखना सँभाल कर दिया

    मुमकिना फ़ैसलों में एक हिज्र का फ़ैसला भी था

    हम ने तो एक बात की उस ने कमाल कर दिया

    मेरे लबों पे मोहर थी पर मेरे शीशा-रू ने तो

    शहर के शहर को मिरा वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया

    चेहरा नाम एक साथ आज याद सके

    वक़्त ने किस शबीह को ख़्वाब ख़याल कर दिया

    मुद्दतों बा'द उस ने आज मुझ से कोई गिला किया

    मंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझ को बहाल कर दिया

    वीडियो
    This video is playing from YouTube

    Videos
    This video is playing from YouTube

    परवीन शाकिर

    परवीन शाकिर

    परवीन शाकिर

    परवीन शाकिर

    RECITATIONS

    सबिहा ख़ान

    सबिहा ख़ान

    सबिहा ख़ान

    चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया सबिहा ख़ान

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY