अब इस क़दर भी तो बे-आबरू न समझा जाए

ख़ालिद अख़लाक़

अब इस क़दर भी तो बे-आबरू न समझा जाए

ख़ालिद अख़लाक़

MORE BYख़ालिद अख़लाक़

    अब इस क़दर भी तो बे-आबरू समझा जाए

    कि आरज़ू को मिरी आरज़ू समझा जाए

    तुम्हारी याद का हर ज़ख़्म रिसता रहता है

    मैं बे-वुज़ू हूँ मगर बा-वज़ू समझा जाए

    मैं अपने आप से ख़ल्वत में बात करता हूँ

    उसे मरज़ मेरे चारा-जू समझा जाए

    वो अपना अक्स अगर मुझ में देख ही सके

    तो आइने को मिरे रू-ब-रू समझा जाए

    मैं सिर्फ़ सुनता हूँ और सिर्फ़ बोलता वो है

    उसे ख़ुदा के लिए गुफ़्तुगू समझा जाए

    ये एक रोज़ कोई इंक़लाब लाएगा

    मिरा लहू है उसे बस लहू समझा जाए

    भटक रहा है अगर दिल नमाज़ में तो मियाँ

    जो क़िबला-रू है उसे क़िबला-रू समझा जाए

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY