अब के सहरा में अजब बारिश की अर्ज़ानी हुई

इरफ़ान सिद्दीक़ी

अब के सहरा में अजब बारिश की अर्ज़ानी हुई

इरफ़ान सिद्दीक़ी

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    अब के सहरा में अजब बारिश की अर्ज़ानी हुई

    फ़स्ल-ए-इम्काँ को नुमू करने में आसानी हुई

    प्यास ने आब-ए-रवाँ को कर दिया मौज-ए-सराब

    ये तमाशा देख कर दरिया को हैरानी हुई

    सर से सारे ख़्वान ख़ुशबू के बिखर कर रह गए

    ख़ाक-ए-ख़ेमा तक हवा पहुँची तो दीवानी हुई

    दूर तक उड़ने लगी गर्द-ए-सदा ज़ंजीर की

    किस क़दर दीवार-ए-ज़िंदाँ को पशेमानी हुई

    तुम ही सदियों से ये नहरें बंद करते आए हो

    मुझ को लगती है तुम्हारी शक्ल पहचानी हुई

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