बहर-ए-हस्ती से भी जी घबरा गया

मोहम्मद उस्मान आरिफ़

बहर-ए-हस्ती से भी जी घबरा गया

मोहम्मद उस्मान आरिफ़

MORE BYमोहम्मद उस्मान आरिफ़

    बहर-ए-हस्ती से भी जी घबरा गया

    बे-कसी बस अब किनारा गया

    कम हुआ करते हैं ऐसे ख़ुश-नसीब

    तुझ पे मर कर जिन को जीना गया

    मेरा मिट जाना तमाशा था कोई

    आप से ये किस तरह देखा गया

    दुख बुरे दिल की कहानी कुछ पूछ

    फूल के हँसने पे रोना गया

    सुब्ह करना शाम-ए-ग़म का अल-अमाँ

    शम्अ' को दाँतों पसीना गया

    ख़ुश रहो तुम चल बसा बीमार-ए-ग़म

    उम्र-भर की उलझनें सुलझा गया

    राह-ए-उल्फ़त में है मरना ज़िंदगी

    दर्द मंज़िल तक मुझे पहुँचा गया

    मौसम-ए-गुल भी है आँखों में ख़िज़ाँ

    दिल ही क्या बैठा चमन मुरझा गया

    वो हुए क्या आँख से 'आरिफ़' निहाँ

    सारी दुनिया में अँधेरा छा गया

    स्रोत
    • पुस्तक : Lamhon Ki Dhadkanen (पृष्ठ 49)
    • रचनाकार : Mohammad Usmaan Arif
    • प्रकाशन : Bedil Academy,Rajisthan (1985)
    • संस्करण : 1985

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