बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले

अख़्तर शीरानी

बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले

अख़्तर शीरानी

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    बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले

    हिसाब होता रहेगा यारब हमें मँगा दे शराब पहले

    फ़ज़ा-ए-शब हँस के जगमगाई वो नाज़नीं सुब्ह बन के आई

    हुआ है रौशन मिरे शबिस्ताँ में चाँद से आफ़्ताब पहले

    ज़बाँ पे आया हर्फ़-ए-मतलब कि कह गईं कुछ शरीर नज़रें

    सवाल करने पाए हैं हम कि मिल गया है जवाब पहले

    जिनाँ में पहले-पहल पिएगा तो लड़खड़ाता फिरेगा ज़ाहिद

    सुरूर-ए-कौसर की है अगर धन जहाँ में पी ले शराब पहले

    है ख़ुसरव-ए-इश्क़ का ये फ़रमाँ कि दिल लगाना नहीं है आसाँ

    जिसे हो कू-ए-बुताँ का अरमाँ वो कू-ब-कू हो ख़राब पहले

    ग़म-ओ-अलम रंज-ओ-यास-ओ-हसरत उठाऊँगा सब के रुख़ से पर्दे

    तुम्हें क़सम है दिल हज़ीं की उठाओ तो तुम नक़ाब पहले

    इलाही वो बू-ए-पैरहन से भी पहले हो हम-कनार कर

    चमन में होता है जल्वा-अफ़रोज़ फूल से माहताब पहले

    ये किस के रंग-ए-रुख़-ए-बहारीं ने बख़्श दी है तरावत-ए-नौ

    शगुफ़्ता होता था गुलिस्ताँ में उस अदा से गुलाब पहले

    निगाह-ए-साक़ी की मुस्कुराई कहा जब 'अख़्तर' ने अपनी धन में

    पिएँगे पीते रहेंगे मय-कश मगर ये ख़ाना-ख़राब पहले

    स्रोत:

    • Book: Kulliyat-e-Akhtar Shirani (Pg. 238)
    • Author: Akhtar Shirani
    • प्रकाशन: Modern Publishing House, Daryaganj New delhi (1997)
    • संस्करण: 1997

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