दामन-ए-दिल पर नई गुलकारियाँ करते रहो
दामन-ए-दिल पर नई गुलकारियाँ करते रहो
ज़िंदगी से जंग की तय्यारियाँ करते रहो
रात कटने तक उन्हें हमवार करने के लिए
अपने अन्दर रोज़ ना-हमवारियाँ करते रहो
दुश्मनों से 'उम्र भर अपने निभाओ दुश्मनी
और यारों से हमेशा यारियाँ करते रहो
'इश्क़ करना ज़िम्मेदारी है नतीजा कुछ भी हो
सिर्फ़ पूरी अपनी ज़िम्मेदारियाँ करते रहो
बे-सबब मरने से अच्छा है कि हो कोई सबब
दोस्तो सिगरेट पियो मय-ख़्वारियाँ करते रहो
'उम्र इतनी कट गई है और भी कट जाएगी
दिल-रुबाओं से यूँही दिलदारियाँ करते रहो
खोल दो दिल और गुज़रने दो हवा-ए-‘इश्क़ को
राख में पैदा नई चिंगारियाँ करते रहो
Subh Bakhair Zindagi
Buy This BookAdditional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.