एक मुद्दत से अधूरा है सरापा अपना

साबिर शाह साबिर

एक मुद्दत से अधूरा है सरापा अपना

साबिर शाह साबिर

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    एक मुद्दत से अधूरा है सरापा अपना

    गुम हुआ जाने कहाँ भीड़ में चेहरा अपना

    मेरी ख़्वाहिश के परिंदे को क़नाअत है पसंद

    सूखी टहनी पे ही करता है बसेरा अपना

    हिर्स कारों के ख़ज़ाने की हुई है जब से

    ख़ैर ख़ैरात से भरता नहीं कासा अपना

    हम ने सीखा है गुलाबों से तकल्लुम का तरीक़

    खुरदुरा हो नहीं सकता कभी लहजा अपना

    है तो आलम की ख़बर अपनी ख़बर ख़ाक नहीं

    अब तसव्वुर में ही खुलता है दरीचा अपना

    उखड़ी उखड़ी सी लगावट को मोहब्बत समझ

    धूप चमके तो ठहरता नहीं साया अपना

    एक इक साँस पे देते रहे जीने का ख़िराज

    ज़िंदगी ने किया तर्क तक़ाज़ा अपना

    आदमियत से मुज़य्यन वो किताबें थीं सुबुक

    आज रद्दी से गिराँ-बार है बस्ता अपना

    सिर्फ़ ख़्वाबों पे इजारा था हक़ीक़त पे नहीं

    हम सराबों को समझते रहे दरिया अपना

    कोई ख़िलअ'त इनायत की तलब है 'साबिर'

    हम तो लिखते हैं शब-ओ-रोज़ क़सीदा अपना

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