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फ़साना जौर-ए-बेहद का कभी दोहरा नहीं सकता

माहिर क़ुरैशी बरेलवी

फ़साना जौर-ए-बेहद का कभी दोहरा नहीं सकता

माहिर क़ुरैशी बरेलवी

MORE BYमाहिर क़ुरैशी बरेलवी

    फ़साना जौर-ए-बेहद का कभी दोहरा नहीं सकता

    करम हर्फ़-ए-शिकायत बन के लब पर नहीं सकता

    मिरे सोज़-ए-निहाँ का राज़ कोई पा नहीं सकता

    जो दिल महसूस करता है ज़बाँ पर नहीं सकता

    अगर चाहूँ तो जल जाए इशारे में नक़ाब उन का

    मगर मैं आतिश-ए-दीदार को भड़का नहीं सकता

    मिरी फ़रियाद की हर लय ब-उन्वान-ए-तरन्नुम है

    समझे कोई मैं इशरत का नग़्मा गा नहीं सकता

    अगर है शौक़-ए-नज़्ज़ारा मज़ाक़-ए-दीद पैदा कर

    बग़ैर-ए-शौक़-ए-बेहद वो नज़र में नहीं सकता

    समझ लें बहर-ए-तूफ़ाँ-ख़ेज़ की ना-आश्ना मौजें

    दिल-ए-साहिल-तलब को अब डुबोया जा नहीं सकता

    हँसे कोई कोई रोए ये अपनी अपनी फ़ितरत है

    मगर 'माहिर' का दिल ग़म से कभी घबरा नहीं सकता

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