हब्स तारी है मुसलसल कैसा

शायर लखनवी

हब्स तारी है मुसलसल कैसा

शायर लखनवी

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    हब्स तारी है मुसलसल कैसा

    अब के बरसा है ये बादल कैसा

    जिस से एहसास की सदियाँ गुज़रीं

    था जुदाई का वो इक पल कैसा

    ले के नज़राना-ए-जाँ कौन आया

    जश्न सा है सर-ए-मक़्तल कैसा

    तेरी तौसीफ़ से ख़ाली हो अगर

    लफ़्ज़ हो जाता है मोहमल कैसा

    वही दिन रात मोहब्बत का जुनूँ

    दिल भी कम-बख़्त है पागल कैसा

    उस ने तो लब अभी खोले भी नहीं

    शोर-ए-नग़्मा है मुसलसल कैसा

    उन के आने की ख़बर से 'शाइर'

    दिल हुआ जाता है बोझल कैसा

    स्रोत :
    • पुस्तक : naquush (पृष्ठ 233)
    • रचनाकार : Mohammad Tufail
    • प्रकाशन : edara faroogh urdu aibak road lahore (1979)
    • संस्करण : 1979

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