कही सब की सुनूँगा अन-सुनी करता रहूँगा

मिद्हत-उल-अख़्तर

कही सब की सुनूँगा अन-सुनी करता रहूँगा

मिद्हत-उल-अख़्तर

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    कही सब की सुनूँगा अन-सुनी करता रहूँगा

    जो मेरे जी में आएगी वही करता रहूँगा

    हँसी में दोस्ती या दुश्मनी करता रहूँगा

    यही करता रहा हूँ और यही करता रहूँगा

    नया चेहरा मुक़ाबिल उस के होगा हर जिहत से

    मैं उस के आइने को हैरती करता रहूँगा

    बदल जाएगा मेरा घर भी सहरा में किसी दिन

    अगर मैं दश्त ही में ज़िंदगी करता रहूँगा

    मना लूँगा उसे जंगाह में ख़ुद क़त्ल हो कर

    मैं अपने भाई को कब तक दुखी करता रहूँगा

    क़सीदा ग़ैर का लिख कर कोई इनआ'म ले लूँ

    मैं अपनी मद्ह-ख़्वानी फिर कभी करता रहूँगा

    करेगा कौन शाही साहिरी साहिब-क़िरानी

    अगर मैं उम्र भर शहज़ादगी करता रहूँगा

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