किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

अख़्तर अंसारी

किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

अख़्तर अंसारी

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    किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    उठाएँ किसी माह-पैकर हसीना के जौर-ओ-सितम इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    ज़माने की बे-रहमियों के तसद्दुक़ दिमाग़-ए-नशात-ओ-अलम ही नहीं

    दिल अपना करे आरज़ू-ए-जफ़ा या उमीद-ए-करम इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    डुबो दें मय-ए-नाब की मस्तियों में फ़लाकत के नक्बत के एहसास को

    बना लें किसी आमियाना से कूज़े ही को जाम-ए-जम इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    हों आज़ाद-ए-अफ़्कार लेकिन तफ़क्कुर में डूबे हुए से रहें रात दिन

    तबीअत की बे-वज्ह अफ़्सुर्दगी के मज़े लूटें हम इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    माज़ी हमारा मुस्तक़बिल अपना कुछ इस तौर से हर्फ़-ए-इमरोज़ हैं

    ग़म-ए-दोश या फ़िक्र-ए-फ़र्दा में 'अख़्तर' करें सर को ख़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : Range-e-Gazal (पृष्ठ 435)
    • रचनाकार : shahzaad ahmad
    • प्रकाशन : Ali Printers, 19-A Abate Road, Lahore (1988)
    • संस्करण : 1988

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