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माल-ओ-ज़र पास है ये फिर भी ख़रीदार नहीं

मोहम्मद मुस्तहसन जामी

माल-ओ-ज़र पास है ये फिर भी ख़रीदार नहीं

मोहम्मद मुस्तहसन जामी

MORE BYमोहम्मद मुस्तहसन जामी

    माल-ओ-ज़र पास है ये फिर भी ख़रीदार नहीं

    तेरे उश्शाक़ को दुनिया से सरोकार नहीं

    तेरे हद-दर्जा तग़ाफ़ुल से ये मैं समझा हूँ

    इस जज़ीरे की फ़ज़ा इतनी मिलनसार नहीं

    मैं ने तन्हाई के जंगल में भटक जाना है

    साथ ले चलिए कि मैं इतना समझदार नहीं

    सोच साहिल की किनारों की भी मुझ जैसी है

    यानी दरिया भी समुंदर का तलबगार नहीं

    इस में हर लम्हा फ़क़त अम्न-ओ-सुकूँ होता है

    ये मेरा दिल है तिरे शहर का बाज़ार नहीं

    और भी लोग तिरी बात से इंकारी थे

    इस रवय्ये का फ़क़त मैं ही सज़ा-वार नहीं

    मेरे जैसे भी हैं कुछ ज़ीस्त के ठुकराए हुए

    हर किसी के लिए ये ज़िंदगी गुलज़ार नहीं

    हाल ये शहर-ए-ख़मोशाँ का नहीं होता था

    रात के पिछले पहर कोई भी बेदार नहीं

    जितनी उजलत में तिरा हिज्र नुमू करता है

    इस क़दर तेज़ किसी चीज़ की रफ़्तार नहीं

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