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मैं जो अपने हाल से कट गया तो कई ज़मानों में बट गया

हनीफ़ असअदी

मैं जो अपने हाल से कट गया तो कई ज़मानों में बट गया

हनीफ़ असअदी

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    मैं जो अपने हाल से कट गया तो कई ज़मानों में बट गया

    कभी काएनात भी कम पड़ी कभी जिस्म-ओ-जाँ में सिमट गया

    यही हाल है कई साल से क़रार-ए-दिल सुकून-ए-जाँ

    कभी साँस ग़म की उलट गई कभी रिश्ता दर्द से कट गया

    मिरी जीती-जागती फ़स्ल से ये सुलूक बाद-ए-सुमूम का

    मिरी किश्त-ए-फ़िक्र उजड़ गई मिरा ज़ेहन काँटों से पट गया

    दयार-ए-दर्द में चैन है सुकून दश्त-ए-ख़याल में

    कभी लम्हा भर को धुआँ छटा तो ग़ुबार राह में अट गया

    वो आरज़ू वो जुस्तुजू वो रंग-ए-जामा-ए-बे-रफ़ू

    भला इस वजूद का वज़्न क्या जो मदार-ए-शौक़ से हट गया

    वो कैफ़-ए-शब वो माह-ए-शब वो कारवान-ए-ग़ज़ाल-ए-शब

    जहाँ ज़िक्र-ए-हिज्र-ओ-विसाल था वो वरक़ ही कोई उलट गया

    स्रोत :
    • पुस्तक : Funoon (Monthly) (पृष्ठ 444)
    • रचनाकार : Ahmad Nadeem Qasmi
    • प्रकाशन : 4 Maklood Road, Lahore (25Edition Nov. Dec. 1986)
    • संस्करण : 25Edition Nov. Dec. 1986

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