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मुक़ावमत है तिरा ग़ुरूर और बद-कलामी

कृष्ण मोहन

मुक़ावमत है तिरा ग़ुरूर और बद-कलामी

कृष्ण मोहन

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    मुक़ावमत है तिरा ग़ुरूर और बद-कलामी

    मुफ़ाहमत है हमारी हुज्जत की ना-तमामी

    हुरूफ़-ए-कूचक में गरचे लिक्खा है नाम-ए-नामी

    मगर है फिर भी जरीदा-ए-शायरी गिरामी

    दरूँ तो उस का नशात-ख़ेज़-ओ-फ़ुसूँ-असर है

    मुज़ाइक़ा क्या अगरचे है सर-वरक़ में ख़ामी

    नए मज़ामीं नए असालीब सूझते क्या

    कि तेरी क़िस्मत में है रिवायात की ग़ुलामी

    अजब चलन है कि लोग बच्चे को गालियाँ दें

    अगरचे हैं वालदैन बच्चा नहीं हरामी

    शरारा-पर्दाज़ है तिरी बरहमी का आलम

    ग़ुसैले अबरू हैं तीर तेग़ों की बे-नियामी

    करें क्यों तेरे हुस्न पर नाज़ सब्ज़ा-ओ-गुल

    कि ज़ीनत-अफ़रोज़ बाग़ है तेरी ख़ुश-ख़िरामी

    सितम मुझे बात बात पर शे'र सूझते हैं

    बला-ए-जाँ बन गई मिरी क़ादिर-उल-कलामी

    ये मुझ से नक़्क़ाद-ए-बे-ख़बर पूछता है अक्सर

    नहीं है क्यों मेरी शायरी में ग़म-ए-अवामी

    अज़ल अबद पर मुहीत हूँ मैं बसीत हूँ मैं

    वजूद मेरा इब्तिदाई इख़तितामी

    कोई समझे कोई जाने तिरे फ़साने

    अजब ये माया अजब ये संसार है स्वामी

    हमेशा रखती है दिल को बेताब 'कृष्ण-मोहन’

    अजीब एहसास है मिरी हैरत-ए-दवामी

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