निशाँ इल्म-ओ-अदब का अब भी है उजड़े दयारों में

साहिर देहल्वी

निशाँ इल्म-ओ-अदब का अब भी है उजड़े दयारों में

साहिर देहल्वी

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    INTERESTING FACT

    अपनी तरह की अनूठी ग़ज़ल जिसमें 58 शायरों का वर्णन है

    निशाँ इल्म-ओ-अदब का अब भी है उजड़े दयारों में

    कि 'सालिम' और 'मुज़्तर' हैं पुरानी यादगारों में

    ग़रज़ 'कैफ़ी'-ओ-'शाइर' 'साइल'-ओ-'बेख़ुद' 'हसन' 'शैदा'

    अलम हैं अर्सा-ए-इल्म-ओ-अदब के शहसवारों में

    'नसीम' 'बर्क़' 'रौनक़' 'ग़ौस' 'कैफ़ी' 'अज़्मी' 'माहिर'

    'शरर' और 'ज़ार'-ओ-'मो'जिज़' नामवर हैं सेहर-कारों में

    'मुबीं' 'यकता' 'क़मर' 'अख़लाक़' 'शौक़' और 'शाकिर'-ओ-'ग़ाफ़िल'

    'मुनीर'-ओ-'शम्स' सब हैं इल्म-ओ-फ़न के दोस्त-दारों में

    'क़ुरैशी' 'वाहिदी' 'आसिफ़-बक़ाई' और 'हसन-ख़्वाजा'

    हैं अहद-ए-हाज़िरा में सब अदब के पुख़्ता-कारों में

    'सईद' 'यास' 'वहशी' 'अम्न' और 'महमूद' और 'अकबर'

    नहीं गो देहली वाले देहलवी हैं इस्तिआरों में

    'मुनव्वर' 'मुंतज़िर' 'बरकत' 'जरी' 'फ़ानी' 'अदीब' 'आशिक़'

    'निहाल' और 'फ़िक्र' आते हैं इसी मद के शुमारों में

    हमारी दर्स-गाहों में अदब के 'नाज़िम'-ओ-'नाशिर'

    ख़ुदा रक्खे नज़र आते हैं अक्सर होनहारों में

    'अली' 'तालिब' 'शैदा' 'ताबाँ' 'साक़ी' 'माइल'

    हुआ ताराज गुलशन जब ख़िज़ाँ आई बहारों में

    'फ़िराक़' और 'मीर' 'नासिर' और 'सिरी-राम' अब कहाँ 'साहिर'

    कि थे इल्म-ओ-अदब के बेहतरीं ख़िदमत-गुज़ारों में

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