नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया

अबुल हसनात हक़्क़ी

नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया

अबुल हसनात हक़्क़ी

MORE BYअबुल हसनात हक़्क़ी

    नुमू तो पहले भी था इज़्तिराब मैं ने दिया

    फिर उस के ज़ुल्म-ओ-सितम का जवाब मैं ने दिया

    वो एक डूबती आवाज़-ए-बाज़-गश्त कि

    सवाल मैं ने किया था जवाब मैं ने दिया

    वो रहा था मगर मैं निकल गया कहीं और

    सो ज़ख़्म-ए-हिज्र से बढ़ कर अज़ाब मैं ने दिया

    अगरचे होंटों पे पानी की बूँद भी नहीं थी

    सुलगते लम्हों को एक सैल-ए-आब मैं ने दिया

    खुला है पहलू-ए-पुर-जोश बे-मुहाबा

    इक और मश्वरा-ए-इंक़िलाब मैं ने दिया

    ये मुझ से गिर्या-ए-बेबाक क्यूँ नहीं होता

    तो अपने दर्द को ख़ुद पेच-ओ-ताब मैं ने दिया

    नख़ील-ओ-किश्त को सैराब मैं नहीं करता

    ज़मीं को क़र्ज़ मगर बे-हिसाब मैं ने दिया

    बदन ख़ुद अपनी ही तज्सीम कर नहीं पाते

    क़रीब आया तो आँखों को ख़्वाब मैं ने दिया

    स्रोत:

    • पुस्तक : Imkaan-e-roz-o-shab (पृष्ठ 89)
    • रचनाकार : Syed Abul Hasnat Haqqi
    • प्रकाशन : Educational Publishing House (2011)
    • संस्करण : 2011

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