शेर कहने की तबीअत न रही

अब्दुल सलाम बंगलौरी

शेर कहने की तबीअत न रही

अब्दुल सलाम बंगलौरी

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    शेर कहने की तबीअत रही

    जिस से आमद थी वो सूरत रही

    उस की दहलीज़ से उठ जाऊँ मगर

    लोग सोचेंगे मोहब्बत रही

    अब मिला अद्ल, गया दौर-ए-शबाब

    मुंसिफ़ी तेरी भी वक़अत रही

    वक़्त की दौड़ में रुकना था कठिन

    साँस लेने की भी फ़ुर्सत रही

    वक़्त-ए-दीदार अजब हुक्म हुआ

    होश खोने की इजाज़त रही

    तुम से जज़्बात थे जब तुम ही नहीं

    फिर ज़माने से शिकायत रही

    मैं निकल आऊँ बयाबाँ से अगर

    शोहरा हो जाएगा वहशत रही

    भीड़ में ढूँडें कहाँ क़ैस को अब

    वो जो पहचान थी वहशत रही

    दौर-ए-रफ़्ता के नमूने हो 'सलाम'

    अब तकल्लुफ़ की ज़रूरत रही

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