सुलगती शाम की दहलीज़ पर जलता दिया रखना

मलिका नसीम

सुलगती शाम की दहलीज़ पर जलता दिया रखना

मलिका नसीम

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    सुलगती शाम की दहलीज़ पर जलता दिया रखना

    हमारी याद का ख़्वाबों से अपने सिलसिला रखना

    सदा बन कर घटा बन कर फ़ज़ा बन कर सबा बन कर

    जाने कब मैं जाऊँ दरीचा तुम खुला रखना

    इन्हीं राहों से लौटूँगी आऊँ ये भी मुमकिन है

    मगर तुम रेत पर महफ़ूज़ अपने नक़्श-ए-पा रखना

    पढ़ ले कोई तहरीरें तुम्हारे ज़र्द चेहरे की

    दर-ओ-दीवार घर के शोख़ रंगों से सजा रखना

    जो बहनें मुफ़्लिसी से भाइयों पर बोझ बनती हैं

    वो मर जाएँ तो उन के हाथ में शाख़-ए-हिना रखना

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    अज़रा नक़वी

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    सुलगती शाम की दहलीज़ पर जलता दिया रखना अज़रा नक़वी

    स्रोत
    • पुस्तक : Word File Mail By Salim Saleem

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