तुम्हारी फ़ुर्क़त में मेरी आँखों से ख़ूँ के आँसू टपक रहे हैं

असर सहबाई

तुम्हारी फ़ुर्क़त में मेरी आँखों से ख़ूँ के आँसू टपक रहे हैं

असर सहबाई

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    तुम्हारी फ़ुर्क़त में मेरी आँखों से ख़ूँ के आँसू टपक रहे हैं

    सिपहर-ए-उल्फ़त के हैं सितारे कि शाम-ए-ग़म में चमक रहे हैं

    अजीब है सोज़-ओ-साज़-ए-उल्फ़त तरब-फ़ज़ा है गुदाज़-ए-उल्फ़त

    ये दिल में शोले भड़क रहे हैं कि लाला गुल महक रहे हैं

    बहार है या शराब-ए-रंगीं नशात-अफ़रोज़ कैफ़-आगीं

    गुलों के साग़र छलक रहे हैं गुलों पे बुलबुल चहक रहे हैं

    जहाँ पे छाया सहाब-ए-मस्ती बरस रही है शराब-ए-मस्ती

    ग़ज़ब है रंग-ए-शबाब-ए-मस्ती कि रिंद ज़ाहिद बहक रहे हैं

    मगर 'असर' है ख़मोश हैराँ हवास गुम चाक दामाँ

    लबों पे आएँ नज़र परेशाँ तो रुख़ पे आँसू टपक रहे हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : awarq-e- gul (पृष्ठ 43)

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