वो मुस्कुरा के दिल-ओ-जाँ पे वार करता है

अतुल अजनबी

वो मुस्कुरा के दिल-ओ-जाँ पे वार करता है

अतुल अजनबी

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    वो मुस्कुरा के दिल-ओ-जाँ पे वार करता है

    कि एक तीर से दो दो शिकार करता है

    मैं उस को दोस्त समझने लगा मगर मुझ को

    वो दुश्मनों में अभी तक शुमार करता है

    ख़याल में भी आए जो मेरे दुश्मन के

    वो काम मेरे लिए मेरा यार करता है

    उस आदमी से तो हर वक़्त होशियार रहो

    जो दूसरों से तुम्हें होशियार करता है

    बस एक माँ ही मिरी राह देखे है वर्ना

    किसी का कौन यहाँ इंतिज़ार करता है

    तमाम लोगों से रहता है होशियार मगर

    वो 'अजनबी' पे बहुत ए'तिबार करता है

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