यादों का अजीब सिलसिला है

फ़ारिग़ बुख़ारी

यादों का अजीब सिलसिला है

फ़ारिग़ बुख़ारी

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    यादों का अजीब सिलसिला है

    सोया हुआ दर्द जाग उठा है

    मिट भी चुके नक़्श-ए-पा मगर दिल

    महकी हुई चाप सुन रहा है

    दीवारें खड़ी हुई हैं लेकिन

    अंदर से मकान गिर रहा है

    पूछे है चटक के ग़ंचा-ए-ज़ख़्म

    अजनबी तेरा नाम क्या है

    किस शो'ला-बदन की याद आई

    दामान-ए-ख़याल जल उठा है

    सोचा है ये मैं ने पी के अक्सर

    नश्शे में ये रौशनी सी क्या है

    क़ातिल को दुआएँ दो कि 'फ़ारिग़'

    हर ज़ख़्म-ए-वफ़ा ग़ज़ल-सरा है

    स्रोत :
    • पुस्तक : غزل اس نے چھیڑی-6 (पृष्ठ 176)
    • रचनाकार : فرحت احساس
    • प्रकाशन : ریختہ بکس ،بی۔37،سیکٹر۔1،نوئیڈا،اترپردیش۔201301 (2019)

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