हास्य/व्यंग्य शेर


हास्य हमे, कुछ देर के लिए ही सही, अपनी समस्याओं और यातनाओं को भूल कर हँसने का मौक़ा देकर हमें तनाव-मुक्त करता है। दूसरी तरफ़ व्यंग्य हमें व्यक्तिगत और सामूहिक जिंदगी की विसंगतियों, विद्रपताओं और पाखंड के प्रति सजग करता है। रेख़्ता ने आप के लिए संकलित की हैं। उर्दू शायरी और गद्द में हास्य/व्यंग्य की बहुत सी दिलचस्प और मन मोह लेने वाली स्तरीय रचनाएँ।

info iconअर्थ के लिए शब्द पर क्लिक कीजिए

आशिक़ी का हो बुरा उस ने बिगाड़े सारे काम


हम तो ए.बी में रहे अग़्यार बी.ए हो गए

अकबर दबे नहीं किसी सुल्ताँ की फ़ौज से


लेकिन शहीद हो गए बीवी की नौज से

बी.ए भी पास हों मिले बी-बी भी दिल-पसंद


मेहनत की है वो बात ये क़िस्मत की बात है

बाल अपने बढ़ाते हैं किस वास्ते दीवाने


क्या शहर-ए-मोहब्बत में हज्जाम नहीं होता

बेगम भी हैं खड़ी हुई मैदान-ए-हश्र में


मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ख़ुदा माँग

बेटे को चैक समझ लिया स्टेट-बैंक का


सम्धी तलाश करने लगे हाई रैंक का

बोले वो बोसा-हा-ए-पैहम पर


अरे कम-बख़्त कुछ हिसाब भी है

बूट डासन ने बनाया मैं ने इक मज़मूँ लिखा


मुल्क में मज़मूँ फैला और जूता चल गया

बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के


ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

बुतों के पहले बंदे थे मिसों के अब हुए ख़ादिम


हमें हर अहद में मुश्किल रहा है बा-ख़ुदा होना

कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया


जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया

धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का


चंदा वसूल होता है साहब दबाव से

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली


चलो बस हो चुका मिलना तुम ख़ाली हम ख़ाली

ग़ज़ब है वो ज़िद्दी बड़े हो गए


मैं लेटा तो उठ के खड़े हो गए

गोग्गल लगा के आँख पर चलने लगे हसीन


वो लुत्फ़ अब कहाँ निगह-ए-नीम-बाज़ का

इल्म में झींगुर से बढ़ कर कामराँ कोई नहीं


चाट जाता है किताबें इम्तिहाँ कोई नहीं

इन को क्या काम है मुरव्वत से अपनी रुख़ से ये मुँह मोड़ेंगे


जान शायद फ़रिश्ते छोड़ भी दें डॉक्टर फ़ीस को छोड़ेंगे

इस क़दर था खटमलों का चारपाई में हुजूम


वस्ल का दिल से मिरे अरमान रुख़्सत हो गया

जब भी वालिद की जफ़ा याद आई


अपने दादा की ख़ता याद आई

जब ग़म हुआ चढ़ा लीं दो बोतलें इकट्ठी


मुल्ला की दौड़ मस्जिद 'अकबर' की दौड़ भट्टी

जो वक़्त-ए-ख़त्ना मैं चीख़ा तो नाई ने कहा हँस कर


मुसलमानी में ताक़त ख़ून ही बहने से आती है

मय भी होटल में पियो चंदा भी दो मस्जिद में


शैख़ भी ख़ुश रहें शैतान भी बे-ज़ार हो

मैं भी ग्रेजुएट हूँ तुम भी ग्रेजुएट


इल्मी मुबाहिसे हों ज़रा पास के लेट

मय-ख़ाना-ए-हस्ती का जब दौर ख़राब आया


कुल्लड़ में शराब आई पत्ते पे कबाब आया

तअल्लुक़ आशिक़ माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था


मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीवी मियाँ हो कर