एक कैफ़ियत

जावेद शाहीन

एक कैफ़ियत

जावेद शाहीन

MORE BYजावेद शाहीन

    धुँद के दरमियान मुअल्लक़ दिनों में

    ख़ुश्क लम्हे मेरे अंदर गिरते रहते हैं

    और दिल को भर देते हैं

    मैं क़दम धरने से डरता हूँ

    सोचता हूँ

    कहीं कुछ टूट जाए

    और आराम की ख़्वाहिश-मंद हवा

    नींद से जाग जाए

    लम्बी फ़राग़तों में

    आसमान की ख़ाली नीलाहटों को

    गर्द से भरते देखता रहता हूँ

    एक जैसे मनाज़िर

    फ़रार की ख़्वाहिश में

    चारों तरफ़ देखते रहते हैं

    चोर रास्ते तलाश करते रहते हैं

    शाम होने से पहले ही

    सर्दी के तेज़ रेज़े

    बदन में उतरने लगते हैं

    हवा की ग़ैर-मौजूदगी में

    बिखरे हुए ख़ुश्क लम्हों को

    ख़ुद ही जमा करता हूँ

    उन से आग रौशन करता हूँ

    ग़ैर-महफ़ूज़ रातों में जागने के लिए

    ज़िंदा रहने के लिए

    स्रोत:

    • पुस्तक : Ishq e Tamam (पृष्ठ 337)

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