जोखम

उदय बंसल

जोखम

उदय बंसल

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    जब कभी मैं अपनी कोई

    पुरानी लिखी नज़्म उठाऊँ

    तो वो कुछ बदली बदली सी लगती है

    उसे जितनी बार पढ़ो उतनी ही बार

    मेरी राय उस के बारे में बदलने लगती है

    कि कभी नज़्म जी को अच्छी लगती है

    तो कभी अखरती है

    कभी चेहरे पे मुस्कान तो कभी माथे पे शिकन

    आने लगती है

    इस उलझन का क्या कोई हल है

    क्या मैं अपने क़लम पे भरोसा कर

    अपनी चिंताओं को नज़र-अंदाज़ कर

    अपनी नज़्में दुनिया के हवाले कर सकता हूँ

    क्या मैं ये जोखम ले सकता हूँ

    नतीजा कुछ भी हो

    मोती की तलाश में समुंदर की गहराइयों में

    ग़ोता-ख़ोर जाने से ख़ुद को रोक नहीं सकता

    बारिश हो हो फ़स्ल उगे उगे

    किसान बोवाई करना हल चलाना छोड़ नहीं सकता

    अगर ग़ौर किया जाए

    तो जोखम वो मोल ले रहा है

    जो मेरी नज़्में पढ़ने वाला है

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