यौम-ए-मई

हबीब जालिब

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हबीब जालिब

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    सदा रही है मरे दिल से पैहम

    कि होगा हर इक दुश्मन-ए-जाँ का सर ख़म

    नहीं है निज़ाम-ए-हलाकत में कुछ दम

    ज़रूरत है इंसान की अम्न-ए-आलम

    फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम

    सदा रही है मिरे दिल से पैहम

    ज़िल्लत के साए में बच्चे पलेंगे

    हाथ अपने क़िस्मत के हाथों मलेंगे

    मुसावात के दीप घर घर जलेंगे

    सब अहल-ए-वतन सर उठा के चलेंगे

    होगी कभी ज़िंदगी वक़्फ़-ए-मातम

    फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम

    स्रोत :
    • पुस्तक : Kulliyat Habeeb Jalib (पृष्ठ 343)

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