नज़्में
नज़्म, उर्दू में एक विधा के रूप में, उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दशकों के दौरान पैदा हुई और धीरे धीरे पूरी तरह स्थापित हो गई। नज़्म बहर और क़ाफ़िए में भी होती है और इसके बिना भी। अब नसरी नज़्म (गद्द-कविता) भी उर्दू में स्थापित हो गई है।
प्रमुखतम प्रगतिशील शायरों में विख्यात/ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के समकालीन/अपनी गज़ल ‘मरने की दुआएँ क्यों माँगूँ.......’ के लिए प्रसिद्ध, जिसे कई गायकों ने स्वर दिए हैं
जमशेदपुर, झारखंड से संबंध रखने वाले शायर, ग़ज़ल के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं
महत्वपूर्ण प्रगतिशील शायर। उनकी कुछ ग़ज़लें ' बाज़ार ' और ' गमन ' , जैसी फिल्मों से मशहूर
प्रसिद्ध उपन्यासकार, उर्दू शायर, अनुवादक और जासूसी उपन्यासकार; जासूस “मेजर बलवंत” जैसे लोकप्रिय पात्र के माध्यम से असाधारण ख्याति प्राप्त की
मशहूर शाइरों में शामिल, मुशाइरों में मक़बूल-ए-आम, अपने शेर 'ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने' के लिए विख्यात
प्रसिद्ध पत्रकार और हास्यकार,1938 में रोज़नामा इन्क़िलाब में हास्य और व्यंग्यपूर्ण कॉलम लिखने के लिए जाने जाते हैं।