जहाँ पहुँच के क़दम डगमगाए हैं सब के

उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा

सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं

हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं

ज़माना मुझ से जुदा हो गया ज़माना हुआ

रहा है अब तो बिछड़ने को मुझ से तू बाक़ी

जिन्हें ये फ़िक्र नहीं सर रहे रहे रहे

वो सच ही कहते हैं जब बोलने पे आते हैं

अमीर-ए-कारवाँ है तंग हम से

हमारा रास्ता सब से अलग है

हम से 'आबिद' अपने रहबर को शिकायत ये रही

आँख मूँदे उन के पीछे चलने वाले हम नहीं

शाहराहें दफ़अ'तन शो'ले उगलने लग गईं

घर की जानिब चल पड़ा है शहर घेरा कर तमाम