आदिल मुज़फ़्फ़रपुरी के शेर
ऐसा नहीं कि मैं कोई गुमनाम शख़्स हूँ
सब जानते हैं मुझ को मैं इक 'आम शख़्स हूँ
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एक हिजरत भी कम नहीं होती
आँख किस किस की नम नहीं होती
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उर्दू में बात कीजिए उर्दू में बोलिए
हक़ है ज़बाँ का प्यार का रस इस में घोलिए
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वा'दा अमीर-ए-शहर का दरिया-दिली का था
देख उन का फ़ैज़ शहर को दरिया बना दिया
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