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आरिफ़ुद्दीन आजिज़

- 1763

ग़ज़ल 1

 

शेर 1

देख दामन-गीर महशर में तिरे होवेंगे हम

ख़ूँ हमारा अपने दामन से क़ातिल छुड़ा

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