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अब्बास रिज़वी

पाकिस्तान

ग़ज़ल 10

शेर 10

वो हब्स था कि तरसती थी साँस लेने को

सो रूह ताज़ा हुई जिस्म से निकलते ही

क्या करूँ ख़िलअत दस्तार की ख़्वाहिश कि मुझे

ज़ीस्त करने का सलीक़ा भी ज़ियाँ से आया

वहशत के इस नगर में वो क़ौस-ए-क़ुज़ह से लोग

जाने कहाँ से आए थे जाने किधर गए

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