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अहमद अशफ़ाक़

1969 | क़तर

अहमद अशफ़ाक़

ग़ज़ल 10

शेर 11

फ़ासले ये सिमट नहीं सकते

अब परायों में कर शुमार मुझे

बिकता रहता सर-ए-बाज़ार कई क़िस्तों में

शुक्र है मेरे ख़ुदा ने मुझे शोहरत नहीं दी

ये अलग बात कि तज्दीद-ए-तअल्लुक़ हुआ

पर उसे भूलना चाहूँ तो ज़माने लग जाएँ

चीख़ उठता है दफ़अतन किरदार

जब कोई शख़्स बद-गुमाँ हो जाए

मेरी कम-गोई पे जो तंज़ किया करते हैं

मेरी कम-गोई के अस्बाब से ना-वाक़िफ़ हैं

पुस्तकें 2

Dastaras

 

2014

Shora-e-Samastipur

 

2010