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अख़्तर हुसैन जाफ़री

1932 - 1992

ग़ज़ल 4

 

शेर 3

दिल जहाँ बात करे दिल ही जहाँ बात सुने

कार-ए-दुश्वार है उस तर्ज़ में कहना अच्छा

तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया

चराग़-ए-ख़ुद-कलामी का धुआँ बाज़ार तक आया

शाख़-ए-तन्हाई से फिर निकली बहार-ए-फ़स्ल-ए-ज़ात

अपनी सूरत पर हुए हम फिर बहाल उस के लिए