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अख़तर इमाम रिज़वी

अख़तर इमाम रिज़वी

ग़ज़ल 11

अशआर 15

कम-ज़र्फ़ ज़माने की हिक़ारत का गिला क्या

मैं ख़ुश हूँ मिरा प्यार समुंदर की तरह है

अब भी आती है तिरी याद इस कर्ब के साथ

टूटती नींद में जैसे कोई सपना देखा

मुझ को मंज़िल भी पहचान सकी

मैं कि जब गर्द-ए-सफ़र से निकला

अश्क जब दीदा-ए-तर से निकला

एक काँटा सा जिगर से निकला

थका हुआ हूँ किसी साए की तलाश में हूँ

बिछड़ गया हूँ सितारों से रौशनी की तरह

चित्र शायरी 1

 

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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