अख़्तर शेख़ के शेर
लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर
इस क़दर इज़हार की बे-मानविय्यत से न डर
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पड़ोसी पीटते हैं जब दरीचे और दरवाज़े
मैं ठुमरी छेड़ देता हूँ तराना छोड़ देता हूँ
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