अली रज़ा असीर के शेर
मुतमइन मुझ को न कर झूटी तसल्ली दे कर
गर सुराही में तिरी मय नहीं बाक़ी साक़ी
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टैग : बहाना
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टहल रहा है इक आँसू लबों के पास मिरा
बिगाड़ कुछ नहीं सकती है अब ये प्यास मिरा
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साँसों को बू-ए-ज़ीस्त से कफ़ना दिया गया
ख़ाक-ए-बदन में रूह को दफ़ना दिया गया
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इक मंज़िल-ए-सफ़र भी तो अब तक नहीं मिली
मैं शीन-ए-शायरी पे नहीं हूँ अलिफ़ पे हूँ
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परिंदे देख कर उस शख़्स को पर फड़फड़ाते हैं
जो क़ैद-ए-दिल है ज़ाहिर में मगर आज़ाद लगता है
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डरावना है बहुत है बड़ा घना जंगल
निकल न पाओगे इस से है इक अना जंगल
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