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अमजद नजमी

1899 - 1974

अमजद नजमी

ग़ज़ल 17

शेर 13

वफ़ा की आड़ में क्या क्या हुई जफ़ा हम पर

जो दोस्ती यही ठहरी तो दुश्मनी क्या है

जब दिल ही नहीं है पहलू में फिर इश्क़ का सौदा कौन करे

अब उन से मोहब्बत कौन करे अब उन की तमन्ना कौन करे

किस ग़लत-फ़हमी में अपनी उम्र सारी कट गई

इक वफ़ा-ना-आश्ना को बा-वफ़ा समझा था मैं

कुछ आलिम समझते हैं कुछ जाहिल समझते हैं

मोहब्बत की हक़ीक़त को बस अहल-ए-दिल समझते हैं

वही सुब्ह-ओ-मसा वही शब-ओ-रोज़

ज़िंदगी है वबाल क्या कहिए

पुस्तकें 7

जो-ए-कहकशाँ

 

1969

Shakhsar

Shumara Number-004

1966

Tuloo-e-Sahar

 

1961

Shumara Number-041,042,043

1972

Shumara Number-047

1973

Shumara Number-044,045,046

1973

Shumara Number-048

1973