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अंजुम अंसारी

सीतापुर, भारत

ग़ज़ल 4

 

शेर 3

कितने ही दाएरों में बटा मरकज़-ए-ख़याल

इक बुत के हम ने सैकड़ों पैकर बना दिए

चमक उठे हैं थपेड़ों की चोट से क़तरे

सदफ़ की गोद में 'अंजुम' गुहर नहीं आए

हर एक मोड़ से पूछा है मंज़िलों का पता

सफ़र तमाम हुआ रहबर नहीं आए

 

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