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अंजुम रहबर

1962 | भोपाल, भारत

मुशायरों की लोकप्रिय कवयित्री

मुशायरों की लोकप्रिय कवयित्री

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं

तुझ को दुनिया के साथ चलना है

तू मिरे साथ चल पाएगा

माँ मुझे देख के नाराज़ हो जाए कहीं

सर पे आँचल नहीं होता है तो डर होता है

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में

मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था

तुम को भुला रही थी कि तुम याद गए

मैं ज़हर खा रही थी कि तुम याद गए