ग़ज़ल 2

 

शेर 3

अब भी कुछ लोग मोहब्बत पे यक़ीं रखते हैं

हो जो मुमकिन तो उन्हें देस निकाला दे दो

मैं भी सच कहता हूँ इस जुर्म में दुनिया वालो

मेरे हाथों में भी इक ज़हर का पियाला दे दो

फ़ितरत का ये सितम भी है 'दानिश' अजीब चीज़

सर कैसे कैसे कैसी कुलाहों में रख दिए

 

"लंदन" के और शायर

  • साक़ी फ़ारुक़ी साक़ी फ़ारुक़ी
  • अकबर हैदराबादी अकबर हैदराबादी
  • ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब
  • जौहर ज़ाहिरी जौहर ज़ाहिरी
  • आमिर अमीर आमिर अमीर
  • हिलाल फ़रीद हिलाल फ़रीद
  • यशब तमन्ना यशब तमन्ना
  • जामी रुदौलवी जामी रुदौलवी
  • फ़र्ख़न्दा रिज़वी फ़र्ख़न्दा रिज़वी
  • अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी अब्दुल हफ़ीज़ साहिल क़ादरी