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अर्श सुलतानपुरी

2001 | सुल्तानपुर, भारत

ग़ज़ल 3

 

शेर 5

काश मंज़िल मुझे मिले कभी

मार डाले मुझे सफ़र मेरा

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परवाने की दो मिसालें कि उस को

मोहब्बत नहीं ख़ुद-कुशी की हवस थी

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बिना अल्फ़ाज़ की कोई कहानी है

ख़मोशी सोज़-ए-दिल की तर्जुमानी है

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मुझ को मारा गले लगा ख़ंजर

जो तवक़्क़ो थी तुम से पूरी हुई

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दिल तो वहशी है सोज़ चाहे है

चैन पाए है जब लहू टपके

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