अज़ीम हैदराबादी के शेर
उन से मिलने की इल्तिजा की है
दिल-ए-नादाँ ने ये ख़ता की है
ख़ुद-फ़रेबी में मुब्तला रख कर
ज़ुल्म की तुम ने इंतिहा की है
झुक रही है 'अज़ीम' अपनी जबीं
ये करामत तो नक़्श-ए-पा की है
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