ग़ज़ल 15

शेर 10

जो रुकावट थी हमारी राह की

रास्ता निकला उसी दीवार से

हँसी मज़ाक़ की बातें यहीं पे ख़त्म हुईं

अब इस के बअ'द कहानी रुलाने वाली है

अकेला मैं ही नहीं जा रहा हूँ बस्ती से

ये रौशनी भी मिरे साथ जाने वाली है

मुझे बयान कर रहा था कोई शख़्स

मैं अपनी दास्तान ढूँढता रहा

यूँ तो हर एक शख़्स का अपना ही शोर है

लेकिन किसी से कोई यहाँ बोलता नहीं

पुस्तकें 1

हुरूफ़

 

1987