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ज़िंदगी से ज़िंदगी रूठी रही

आदमी से आदमी बरहम रहा

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी

फिर भी फ़ानी दुनिया में जावेदाँ तो मैं भी हूँ जावेदाँ तो तुम भी हो

मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं

बहता रहता है तिरी याद का दरिया मुझ में

तू ख़ुश है अपनी दुनिया में

मैं तिरी याद में जलता हूँ

एक उलझन रात दिन पलती रही दिल में कि हम

किस नगर की ख़ाक थे किस दश्त में ठहरे रहे

सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं

दर्द भी सूरत-ए-हालात बता देता है

अम्न के सारे सपने झूटे

सपनों की ताबीरें झूटी

हम ने जिन को सच्चा जाना

निकलीं वो सब बातें झूटी

कैसा लम्हा आन पड़ा है

हँसता घर वीरान पड़ा है

गर्मी-ए-शिद्दत-ए-जज़्बात बता देता है

दिल तो भूली हुई हर बात बता देता है

दर्द उट्ठा था मिरे पहलू में

आख़िर-ए-कार जिगर तक पहुँचा

हर कूचे में अरमानों का ख़ून हुआ

शहर के जितने रस्ते हैं सब ख़ूनीं हैं

लोग चले हैं सहराओं को

और नगर सुनसान पड़ा है