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बर्क़ देहलवी

1884 - 1936

दिल्ली की काव्य परम्परा के अंतिम दौर के शायरों में शामिल, अपने ड्रामे ‘कृष्ण अवतार’ के लिए प्रसिद्ध

दिल्ली की काव्य परम्परा के अंतिम दौर के शायरों में शामिल, अपने ड्रामे ‘कृष्ण अवतार’ के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 2

 

नज़्म 1

 

शेर 4

सर-ब-कफ़ हिन्द के जाँ-बाज़-ए-वतन लड़ते हैं

तेग़-ए-नौ ले सफ़-ए-दुश्मन में घुसे पड़ते हैं

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दिन-रात पड़ा रहता हूँ दरवाज़े पे अपने

इस ग़म में कि कोई कभी आता था इधर से

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रहेगा किस का हिस्सा बेशतर मेरे मिटाने में

ये बाहम फ़ैसला पहले ज़मीन आसमाँ कर लें

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पुस्तकें 6

हर्फ़-ए-नातमाम

 

1941

Krishn Darpan

 

1927

Lal-o-Gohar

 

 

Matla-e-Anwar

 

1939

मतला-ए-अनवार

 

1929

Nazr-e-Aqeedat

 

 

 

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